Friday, 4 November 2016

युद्ध की लागत

उड़ी पर हाल ही के एक हमले प्रत्युत्तर में ‘‘सर्जिकल स्ट्राइक”  ने लोगों को भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसी स्थिति के बारे में सोचने के लिए मजबूर किया है। आतंकवादी हमलों से पूरी तरह से इनकार किया जा सकता है पाकिस्तान बड़ी आसानी से कह सकता है कि ऐसे आतंकवादी हमले में उनकी कोई भूमिका नहीं है। हालांकि एकमुश्त युद्ध अलग है। इसमें बहुत अधिक संख्या में जीवन दांव पर है बहुत सारी राजनीति शामिल है।

आर्थिक संसाधनों के लिए युद्ध लड़े गए हैं-जैसे कि तेल, सोना, तार्किक विश्वास अथवा अन्य राष्ट्र से खतरा। हालांकि भारत या पाकिस्तान के संबंध में यह सामान्य कारण नहीं है। खैर कश्मीर पर नियंत्रण एक कारण हो सकता है हालांकि कश्मीर में तेल अथवा ऐसे अन्य प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं जो युद्ध की आर्थिक लागत का औचित्य साबित कर सके। इन देशों के मध्य धर्म को लेकर युद्ध नहीं हो सकता क्योंकि भारत विश्व में मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी में से एक है। भारत मुस्लिमों के विरूद्ध नहीं है अन्यथा उसे बांग्लादेश से भी लड़ना होता।

 यहां तक की दोनों देशों के मध्य के छोटे मोटे झगड़े इतनी दूर तक खींचे गए हैं कि यह बगैर किसी वजह के युद्ध का कारण बन सकते हैं। क्या बगैर किसी कारण के युद्ध जायज़ है? कुछ ही दिनों के भीतर लाखों जीवन अरबों रूपये खो देना क्या एक अच्छा निर्णय हो सकता है?

हम इस पर विस्तार से नज़र डालते हैं - युद्ध की वास्तविक लागत क्या होती है?

कारगिल युद्ध के समय तत्कालीन वित मंत्री यशवंत सिन्हा ने यशस्वी तौर पर कहा था कि एक युद्ध का कोई आर्थिक प्रभाव नहीं पड़ेगा या जब वरिष्ठ अधिकारी दावा करते हैं कि इसकी कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी क्योंकि हथियार गोला बारूद के भंडार पहले ही जमा किए जा चुके हैं तो यह सच्चाई से बहुत दूर है। हालांकि जब हम केवल अपने क्षेत्र का बचाव कर रहे थे तब भी हमें लगभग 10,000 करोड़ रूपये की कीमत चुकानी पड़ी थी, यदि हम रूढ़िवादी अनुमान के अनुसार जाएं।

यह अनुमानित है कि आज उसी युद्ध की कीमत 10 गुना अधिक होगी। इसमें युद्ध के कारण अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसानों को नहीं गिना गया है। शेयर बाज़ार अचानक गिर जाता है, व्यवसायी आत्मविश्वास खो देते हैं विदेशी निवेशक निवेश करने में परिवर्तन कर देते हैं। जीडीपी विकास दर 7 प्रतिशत के लक्ष्य की तुलना में 3 प्रतिशत से कम हो जाएगी।

परंतु अन्य प्रश्न का पूछा जाना आवश्यक है कि युद्ध ना करने की कीमत क्या है?

भारत रक्षा पर सालाना 40 अरब डॉलर खर्च करता है। एक ही देश जिससे हम भयभीत हैं वह है पाकिस्तान। यह राशि कोई छोटी राशि नहीं है क्योंकि यह आवर्तक है वर्ष दर वर्ष बढ़ती ही जा रही है। जीडीपी के प्रतिशत के रूप में यह 2.4 है जबकि पाकिस्तान 7.5 अरब डॉलर खर्च करता है जो कि जीडीपी का 3.6 प्रतिशत है।

ये देश विश्व के सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाले देशों में हैं सामाजिक कल्याण पर पैसा खर्च करने की बजाय ये रक्षा पर खर्च कर रहे हैं। प्रतिवर्ष इनका रक्षा खर्च लगभग 11 प्रतिशत बढ़ता है उनकी जीडीपी एक बहुत कम दर पर बढ़ती है। संकट का बढ़ा हुआ बोध देश में समग्र सुरक्षा का खर्च बढ़ा देता है और इसलिए पड़ोसी के साथ तनाव होने की लागत अकेले रक्षा बजट तक सीमित नहीं है।

एक निर्णायक युद्ध जो दोनों देशों के रक्षा बजट को नीचे लाएगा, एक युद्ध लड़ने की आर्थिक समझ़ के लिए दूरदराज का एक औचित्य है। हालांकि पिछले भारत पाकिस्तान के बीच के सभी युद्धों में पाकिस्तान ऐसा रहा है जिसके अहंकार ने चोट खायी है, केवल बाद में पुनः उभरने के लिए।

एक और समाधान है जो इन देशों को अंतहीन सैन्य खर्च से बाहर आने में सहायता दे सकता है-उस पर अगले सप्ताह नज़र डालते हैं।

भारत पाकिस्तान के बीच का युद्ध दोनों देशों में कई लोगों के लिए दिवास्वप्न रहा है। कुछ के लिये युद्ध में स्वार्थ नीहित है अन्य में पड़ोसी राष्ट्र के विरूद्ध गुस्सा भरा हुआ है। जैसा कि हमने पिछले सप्ताह देखा कि युद्ध की लागत एक ऐसी वस्तु है जिसकी गणना हम तब तक नहीं कर सकते जब तक युद्ध समाप्त नहीं हो जाता। हम जीवन की हानि भी नहीं जानते हैं किस प्रकार वह दोनों देशों में जीडीपी को प्रभावित करेगी।

वह देश जो युद्ध का कारण बनेगा उसे युद्ध के समाप्त हो जाने के बाद लंबे समय तक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना करना होगा। विश्व शक्तियां शायद युद्ध से दूर रहेंगी भारत एवं पाकिस्तान को जल्द से जल्द युद्ध समाप्त करने पर मजबूर करेंगी। जो भी देश इसमें सहमत नहीं होगा उसे किये का परिणाम भुगतना होगा।

दोनों देशों में रक्षा की लागत बहुत बड़ी है स्थिति को हल करने के लिए एक निर्णायक युद्ध की भी। तो हम यह सुनिश्चित करने के लिए क्या कर सकते हैं कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्था का विकास हो?

कोस्टा रिका उन कई देशों में से एक है जिनके पास 1948 से अब तक कोई सेना नहीं है। यह लगभग उसी समय की बात है जब भारत पाकिस्तान को स्वतंत्रता प्राप्त हुई। यह देश बहुत छोटा है और गृह युद्ध

कोस्टा रिका की प्रति व्यक्ति आय 1960 में 380 डॉलर थी जबकि भारत पाकिस्तान में प्रति व्यक्ति आय 83 डॉलर थी। हालांकि 2015 में, कोस्टा रिका में प्रति व्यक्ति आय बढ़ कर 10,600 डॉलर हो गई जबकि भारत 1580 डॉलर पाकिस्तान 1430 डॉलर पर है। जहां कोस्टा रिका की प्रति व्यक्ति आय 27 गुना बढ़ी वहीं भारत पाकिस्तान की 1.9 गुना 1.7 गुना बढ़ी। भारत रक्षा पर जीडीपी के प्रतिशत के रूप में पाकिस्तान से कम खर्च करता है इसलिये हमने एक सीमांत उच्च वृद्धि देखी है।

बगैर स्थायी सेना के, केवल सीमित सैन्य बलों वाले देश

  1. हैती
  2.   आइसलैंड
  3.   जापान
  4.   मॉरीशस
  5.   मोनाको
  6.   पनामा
  7.   वानुअतु 

ऐसे कई देश हैं जिनमें सेना नहीं है। भारत पाकिस्तान को एक साथ सेना को भंग कर देना चाहिये केवल सीमा सुरक्षा बल रखना चाहिये। दोनों देशों को अपनी अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए उस बचत का उपयोग करना चाहिये।

यह सर्वविदित तथ्य है कि अपने सक्षस्त्र बलों पर पाकिस्तान का नियंत्रण नहीं है ऐसा भी माना जाता है कि निहित स्वार्थ दोनों देशों में बीच शांति को प्रबल नहीं होने देते। मान लीजिए की पाकिस्तान में कोई सेना नहीं है? क्यों नहीं इसे कोस्टा रिका की ही तरह भारत की सेना के साथ भंग किया जा सकता? रक्षा बजट हमारे राजकोषीय घाटे का लगभग दोगुना है और यदि भारत सेनाभंग कर देता है तो हमें जीडीपी के कम से कम 1.5 प्रतिशत के बराबर अधिशेष प्राप्त होगा भारत उस अधिशेष को गरीबों के उत्थान के लिए निवेश करने में ध्यान केंद्रित कर सकता है।


आयकर के लिए- नए वर्ष का अर्थ नई कर निर्धारिती

किसी भी लंबी अवधि के वाणिज्यिक संबंधों के लिए ‘‘खाते” की अवधारणा है। तो यदि आप अपने “धोबी” को कपड़े दे रहे हैं, तो वह उसकी डायरी में लिखेगा व एक महीने के बाद “हिसाब” करेगा, आप उसे ऋण दे सकते हैं क्योंकि उसका उल्लेख डायरी में किया जाएगा। यदि आप सतर्क होना चाहते हैं तो आप एक अन्य डायरी बना सकते हैं ताकि यदि वह उसकी डायरी से छेड़खानी करे तो आपके पास सबूत हो। यदि आप हर महीने निश्चित से कम या अधिक भुगतान करते हैं तो वह बस उसे आगे बढ़ा देगा। मैं अपने कपड़ों को इसी तरीके से इस्त्री होते हुए देखकर बड़ा हुआ हूँ और मुझे यकीन है कि भारत के 90 प्रतिशत धोबी इसी तरह काम करते हैं और इसी तरह लंबी अवधि के वाणिज्यिक संबंध भी। हालांकि भारत में आयकर इतना सरल नहीं है। सबसे पहले आपको स्वयं अनुमान लगाना होता है कि एक वित्तीय वर्ष में आप कितनी आय अर्जित करने वाले हैं व तदानुसार आपकी कुल आयकर देनदारी की गणना करनी होती है। दूसरा, उस वित्तीय वर्ष में आपको लगभग चार बराबर त्रैमासिक किश्तों में अग्रिम कर का भुगतान करना होता है। तीसरा, यदि आप आपके दायित्व के 90 प्रतिशत से कम का भुगतान करते हैं तो आपको वार्षिक आयकर रिटर्न के साथ शेष राशि पर ब्याज देना होगा। इसलिए यदि आयकर की पहली तिमाही के भुगतान के बाद किसी भी समय आपको आपके व्यवसाय में अप्रत्याशित मुनाफा हो जाता है तो उसे 12 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज का भुगतान करना होगा। कोई भी व्यापारी इस ब्याज का भुगतान कर अप्रसन्न नहीं होगा व अप्रत्याशित लाभ एक अच्छी वस्तु है। यह सब समझने योग्य है। कई बार व्यवसायों में अप्रत्याशित हानि हो जाती है। भारत का कारोबारी माहौल इतना अप्रत्याशित होने के कारण अप्रत्याशित हानि की संख्या अप्रत्याशित लाभ से अधिक है! यदि किसी मालिक के पास फरवरी के महीनें में एक बड़ी डूबी हुई रकम है तो उसके पूरे वर्ष का मुनाफा कमज़ोर हो जाता है। कम मार्जिनों के साथ ऐसा होने की काफी संभावना होती है कि एक ग्राहक की बकाया राशि में पूरे वर्ष का लाभ बंद होता है। नीयमों के अनुसार ऐसा है कि व्यापारी ने जनवरी के पहले ही उसके आयकर दायित्व का 75 प्रतिशत चुका दिया होता है। इस अप्रत्याशित हानि के कारण अब उसका कोई आयकर दायित्व नहीं है। तो यह अग्रिम रूप से चुकाया गया कर आयकर विभाग द्वारा 6 प्रतिशत ब्याज प्रतिवर्ष के साथ वापस किया जाएगा।

अब वह भाग आता है जो वास्तव में मुझे चिंतित करता है। ठीक एक वर्ष बाद फरवरी के महीने में, अचानक व्यापारी को पता चलता है कि वही ग्राहक जिसे पिछले वर्ष डूबी हई राशि माना जाता था अब पूरी बकाया राशि चुकाने के लिए सहमत हो गया है। इससे एक अप्रत्याशित आय होगी व अब तक अग्रिम रूप से चुकाये गये कर में न्यूनता आएगी व दंडात्मक ब्याज लगाया जाएगा।

मुझे आश्चर्य होता है कि कर निर्धारण के विकल्प के रूप में पिछले वर्ष चुकाये गये ऋण को भविष्य के वर्षों के लिए आगे ले जाने के लिए आयकर नीयम संशोधित क्यों नहीं किया जा सकता। यह रीफंड (पुनः वापसी), रीफंड पर ब्याज व वर्ष दर वर्ष सटीक आयकर दायित्व की गणना की कई सारी परेशानियों से बचाएगा। साथ ही, ब्याज दर एक ही होनी चाहिये चाहे आयकर का भुगतान किया जाना हो अथवा निर्धारित कर का भुगतान करना हो। आयकर को बैंक की तरह पैसे नहीं बनाने चाहिये! तो इन सरल संशोधनों के साथ मुझे यकीन है कि दंडात्मक ब्याज से बचने के लिए लोग थोड़ा सा अधिक ब्याज चुकाने में अधिक सहज महसूस करेंगे। 

Saturday, 1 October 2016

जीएसटी एटले आमतौर पर सामान्य कर

1954 में फ्रांस से प्रारंभ होने के बाद से वस्तु एवं सेवा कर 150 राष्ट्रों में लागू किया गया है। जीएसटी को शुरू करने का मुख्य उद्देश्य कर-राजस्व बढ़ाना नहीं बल्कि राष्ट्र की कराधान संरचना को सरल करना है। किसी भी राष्ट्र में दो प्रकार के कर होते हैं- प्रत्यक्ष कर व अप्रत्यक्ष कर। प्रत्यक्ष कर आयकर जैसा है जो करदाता से प्रत्यक्ष तौर पर प्रभारित किया जाता है। अप्रत्यक्ष कर उत्पाद शुल्क, बिक्री कर, सेवा कर जैसे हैं जिनका भुगतान वास्तव में ग्राहकों से वसूल करने के बाद व्यापारियों द्वारा किया जाता है।

जीएसटी सभी अप्रत्यक्ष करों को एक छतरी के अंतर्गत सम्मिलित करता है व व्यापारियों को विभिन्न सरकारी विभागों के पृथक पृथक आज्ञापालन से राहत देता है। अप्रत्यक्ष कर केंद्र सरकार व राज्य सरकार द्वारा प्रभारित किए जाते हैं।

केंद्रीय कर जो जीएसटी के अंतर्गत शामिल हो सकते हैं

केंद्रीय उत्पाद शुल्क
  • अतिरिक्त उत्पाद शुल्क
  • सेवा कर
  • अतिरिक्त सीमा शुल्क
  • केंद्रीय बिक्री कर
  • उपकर (संघ द्वारा लगाए गए)
  • अधिभार (संघ द्वारा लगाए गए) 


राज्य अप्रत्यक्ष कर जो जीएसटी के अंतर्गत शामिल हो सकते हैं
  • वैट
  • क्रय कर
  • राज्य उत्पाद शुल्क (शराब के अतिरिक्त)
  • मनोरंजन कर
  • विलासिता कर
  • प्रवेश कर
  • लाटरी, सट्टेबाजी व जुए पर कर


सरकार द्वारा एक समय की अवधि में बनाई गई कराधान भुलभुलैया को सरल बनाने का एकमात्र उपाय जीएसटी है। आम आदमी कराधान की इस जटिल संरचना से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है। मैंने कुछ रेस्तरां को कर योग्य, गैर कर योग्य वस्तुएं, उच्च वैट, कम वैट व सेवा कर के विभाजन के साथ बिल प्रदान करते देखा है। यह जानने के लिए कि रेस्तरां का एक सरल सा बिल सही है अथवा नहीं, अप्रत्यक्ष करों (केंद्र व राज्य दोनो) के विषय में अच्छे ज्ञान की आवश्यकता है। जीएसटी इस बिल को बहुत सरल बना देगा। केवल एक कुल राशि व बिल की सभी वस्तुओं पर कर की एकमात्र दर। इससे हमें आसानी से निश्चित करने में सहायता प्राप्त होगी कि बिल सही है अथवा नहीं।

व्यापारियों के लिए एक सरकारी विभाग को त्रैमासिक व वार्षिक वापसी दाखिल करना आसान हो जाएगा। इसके अलावा विवाद की स्थिति में व्यापारी को एक ही प्राधिकरण को अपील करनी होगी। वर्तमान में मैंने साफ्टवेयर कंपनियों जैसा व्यवसाय देखा है जो दोनो विभागों के मध्य झगड़े से बचने के लिए वैट व सैट दौनो प्रभारित कर रहे हैं। कामकाज की वर्तमान स्थिति में ग्राहक अथवा व्यापारी में से एक को कष्ट झेलना पड़ता है।

भारत व्यापार करने की सुविधा में बहुत निचले पायदान पर आता है, 189 राष्ट्रों की सूची में 142वां स्थान और साथ ही यह कराधान सरलता के लिए 183 राष्ट्रों में से 147वें स्थान पर आता है। जीएसटी हमारे स्थान में सुधार लाएगा और इस तरह आगामी उद्यमियों को उनका स्वयं का व्यापार प्रारंभ करने में सहायता प्राप्त होगी। संक्षेप में कहें तो जीएसटी का अर्थ है आमतौर पर सामान्य कर। 

एफएम को बहु क्षेत्रवार सुधार करने चाहिए-इस बजट में अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए।

यह कहा जाता है कि राजनीति में 80 प्रतिशत कराधान है और इसलिए केंद्रीय बजट भारत सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है। सरकार को राज करने के लिए कमाने की आवश्यकता है हालांकि नागरिकों को वह सरकार पसंद आएगी जो सबसे कम कर प्रभारित करती हो। सरकारें चुनाव जीतने के लिए व सत्ता में रहने के लिए लोकलुभावनबजट दे देती हैं। इससे वित्त को क्षति पहुँचती है व सरकार पैसे के बगैर राज नहीं कर सकती है। यह वैसे भी सरकार की दुबारा चुनाव जीतने की क्षमता को क्षीण करती है!

इस वर्ष एफएम की एक आदर्श स्थिति है जहाँ वह निम्नलिखित के कारण बजट एक बड़ा सुधार दिला सकता हैः

  • उन राज्यों में कोई बड़े चुनाव नहीं आने वाले हैं जहाँ भाजपा सत्ता में आ सकती है। सबसे बड़े राज्य जहाँ 2016 में चुनाव होने वाले हैं वे तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल हैं। दोनों ही स्थानों पर बीजेपी स्वयं के बूते पर नहीं लड़ने वाली है। इन दोनों की 34 राज्य सभा सीटंे हैं। छोटे राज्य जैसे केरेला, पुडुचेरी एवं आसाम की कुल 17 सीटें हैं। यदि भाजपा सभी 5 चुनाव हार भी जाए तो भी यह उनकी राज्य सभा महत्त्वाकांक्षा को क्षति नहीं पहुँचाएगी क्योंकि मतदाता लोकलुभावन भाजपा केंद्रीय बजट की वजह से भाजपा गठबंधन वाली क्षेत्रीय पार्टी को नहीं चुनने वाले हैं।

  • 1990 में आर्थिक सुधारों की वजह से अर्थव्यवस्था को बल मिला था क्योंकि वे कई क्षेत्रों में थे। आज पर्याप्त सबूत मौजूद हैं कि हमें उद्योग के 1 या 2 क्षेत्र नहीं बल्कि सभी क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है। होटल उद्योग के कष्ट झेलने पर एयरलाइन उद्योग किस प्रकार विकसित हो सकता है। लोगों के पास एक घर खरीदने का खर्च वहन करने की क्षमता होने के बगैर अचल संपत्ति उद्योग किस प्रकार विकसित हो सकता है?

  • विश्व की अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है विश्वभर में शायद ही ऐसा कोई देश है जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए आकर्षक दिखाई देता हो। भारत द्वारा किए गए प्रभावशाली सुधार इसे विश्व के नक्शे पर आकर्षक बना सकते हैं व बहुत सारे धन को भारत की ओर आकर्षित किया जा सकता है।

  • दिल्ली में आप की सरकार तेजी से प्रगति कर रही है और यह भाजपा के विभिन्न राज्य चुनावों के लिए एक खतरा हो सकती है जहाँ भी आप प्रतिस्पर्धी है। भाजपा कांग्रेस को हरा सकती है परंतु आप ने दिल्ली में भाजपा को इतने अधिक अंतर से हराया है जो इससे पहले किसी भी पार्टी ने नहीं किया है। यह बजट आप सरकार को माकूल जवाब देने का एकमात्र अवसर हो सकता है कि भाजपा भी कुछ अभिनव कर सकती है व भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास कर सकती है।

  • उपयोग की वस्तुएं निर्यात करने वाले राष्ट्र एक उथल-पुथल से गुज़र रहे हैं। वस्तुएं जैसे तैल, स्वर्ण व अन्य धातु अधिक महंगी नहीं हो रहीं हैं। इन राष्ट्रों को केवल अपने घाटे को बनाए रखने के लिए उत्पादन करना जारी रखना होगा। भारत के पास वस्तुओं का उपभोग करने का व विकास करने का शानदार अवसर है।


निवेश का चक्र-कार्य का विकास- राष्ट्र को एक स्थिर गति पर विकसित करने के लिए निवेश पर वापसी को बढ़ाते रहना होगा। उदाहरण के लिए पर्यटन उद्योग पूंजी व अवसंरचना का वित्तपोषण करने वाले स्थानीय पर्यटकों के बगैर पनप नहीं सकता। अवसंरचना का निर्माण होने के बाद विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करना आसान है जो वास्तव में अर्थव्यवस्था का विकास करते हैं।

विदेशी मुद्रा प्राप्त करने का एक आसान तरीका विदेशियों के लिए अचल संपत्ति क्षेत्र उपलब्ध कराना है। चीनी लोग केवल एक ही घर खरीद सकते हैं इसलिए वे संयुक्त राज्य में कनाडाई लोगों के अलावा सबसे अधिक संपत्ति खरीदने वालों में से एक हैं। विश्व उन छोटे राष्ट्रों से भरा पड़ा है जो उपयोग की वस्तुओं का आयात करने के लिए उनकी अचल संपत्ति बेचते हैं। भारतीयों के पास 800 डॉलर मूल्य के बराबर मात्रा में सोना है-जिसमें से अधिकांश आयात किया हुआ है। हमने उसके लिए भुगतान किस प्रकार से किया? बिल गेट्स ने कहा था कि भूमि का स्वामित्व आसानी से विदेशियों को दे दिया जाना चाहिए क्योंकि यह वह एक वस्तु है जो वे लोग जहाजों में लादकर देश से बाहर नहीं ले जा सकते। भारत को उसकी बढ़ती हुई जनसंख्या को शहरों में स्थानांतरित होकर कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए बहुत सारा निवेश करना होगा। विदेशी निवेश के बगैर इस विस्तरण का वित्तपोषण करना असंभव होने वाला है। भारत में इतनी आकर्षक प्रतिफल दर के कारण बहुत से प्रवासी भारतीय भारत में निवेश करने में रूचि लेंगे।

भारत में निवेश करने की एकमात्र समस्या मुद्रा अवमुल्यन है जो केवल तभी रोका जा सकता है जब हम हमारे निर्यात को बढ़ा कर व हमारी भूमि को बेचकर पर्याप्त विदेशी मुद्रा प्राप्त कर सकें। विनिमय दर में स्थिरता निवेश में आत्मविश्वास उत्पन्न करेगी एवं अधिक निवेश लाएगी।

एफएम के पास इस तरह के गौण, बहु क्षेत्रीय सुधार लाने का जो अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकते हैं, व भारत को विश्व के केंद्रीय मंच पर लाने का अद्भुद अवसर है।